Tuesday, 13 June 2017

WHO I AM ? मैं कौन हूँ ?

नाम (Name) 

मुझे आज लोग भोला कहते हैं। भोला मेरा एक नाम हैं। लेकिन जब प्रसव हुआ तब मेरा कोई नाम नहीं था। लेकिन तब भी मेरा अस्तित्व था। मेरे घर वालों ने थोड़े ही दिनों के बाद मेरा नामकरण किया। उस वक्त अगर मेरे घर वालों  ने मेरा नाम भोला की जगह अगर मोला रखा होता तो आज लोग मुझे मोला कहतें। मैं न तो गर्भ में भोला था और ना ही मेरे ईस शरीर के नाश हो जाने के बाद भोला रहूँगा। यह तो केवल मेरे घर वालों ने निर्देष किया हुआ एक सांकेतिक नाम हैं। जो जब चाहे बदला जा सकता हैं। जो विवेकवान पुरुष इस रहष्य को समज लेता है की में एक नाम नहीं हूँ ,में अनामी हूँ। इस से वह इस नाम की निंदा से कभी भी सुखी या दुखी नहीं होता हैं। इस बात से यह सिध्ध  होता हैं की में एक नाम नहीं हूँ।

शरीर (Body) :

 शरीर एक जड हैं। मैं एक चेतन हूँ। शरीर क्षय , वृध्धि , उत्पत्ति  और विनाश के स्वभाव वाला हैं। मैं इन सब चीजों से सर्वदा परे हूँ। बचपन में मेरे शरीर का स्वरुप कुछ और था।  ऐसे ही युवावस्था और वृध्धावस्था में शरीर का स्वरुप कुछ अलग हैं। परन्तु इन तीनो अवस्थाओं को जाननेवाला में एक ही हूँ। इस लिए मैं यह शरीर नहीं हूँ। मैं शरीर का ज्ञाता हूँ।

इन्द्रियां (Senses) 

मैं इन्द्रिय भी नहीं हूँ। हाथ और पैर अगर कट जाए , आँखें नष्ट हो जाए , कान बेहरे हो जाते हैं , तब भी मैं जहाँ का तहां पूर्ववत् ही हूँ। मैं कभी मरता नहीं हूँ। अगर में इन्द्रिय होता तो उसके विनाश के साथ मेरा भी विनाश संभव होता। उसकी हानि के साथ मुझे भी हानि होती। इसलिए मैं जड इन्द्रिय नहीं हूँ , लेकिन इन्द्रियों का द्रष्टा या ज्ञाता हूँ। मैं भिन्न हूँ।

मन (Mind:

मैं मन भी नहीं हूँ। नींद में मन रहेता नहीं हैं परन्तु मैं रहता हूँ। इस लिए नींद में से जगने के बाद मुझे इस बात का ज्ञान होता हैं की में शांति से सो रहा था। दूसरी द्रष्टि से भी मन के अनुपस्थित काल में मेरी जीवित सत्ता प्रसिध्ध हैं। मन विकारी हैं। मन में होते विकारो का मैं ज्ञाता हूँ। खान – पान – स्नान आदि के समय अगर मेरा ध्यान अगर दूसरी जगह पर रहा तो इन कामो में कोई न कोई भूल हो जाती हैं। फिर में सचेत हो कर कहता हूँ की मेरा मन किसी दूसरी जगह पर था इस लिए मुझसे गलती हो गयी। क्योंकि केवल शरीर और इन्द्रियों से मन के बिना सावधानी पूर्वक काम नहीं हो सकता। मन चंचल हैं पर मैं स्थिर हूँ। अचल हूँ। मन कहीं भी रहे , कुछ भी करता रहे मैं उसको जानता हूँ। इसलिए मैं मन का ज्ञाता हूँ। मन नहीं हूँ।

बुध्धि (intelligence) :

मैं बुध्धि भी नहीं हूँ। क्योंकि बुध्धि भी क्षय-वृध्धि के स्वभाव वाली हैं। मैं क्षय-वृध्धि से सर्वथा परे हूँ। बुध्धि में मंदता , तीव्रता , पवित्रता , मलिनता , स्थिरता और अस्थिरता जैसे विकार होते हैं। परन्तु मैं इन सब से परे हूँ और सब स्थितिओं से वाकेफ हूँ। बुध्धि कब और कौन सा विचार कर रही हैं , क्या निर्णय कर रही हैं वह मैं जानता हूँ। बुध्धि द्रश्य हैं और मैं एक द्रष्टा हूँ। बुध्धि से मेरा पृथकत्व सिध्ध हैं। इस लिए में बुध्धि नहीं हूँ।
इस तरह मैं नाम , शरीर , इन्द्रिय , मन और बुध्धि नहीं हूँ। इन सब से सर्वथा अतीत , पृथक , चेतन , द्रष्टा , साक्षी , सब का ज्ञाता , सत्य , नित्य , अविनाशी , अकारी , अविकारी , अक्रिय , अचल , सनातन , अमर और समस्त सुख – दुःख से रहित केवल शुध्ध आनंदमय आत्मा हूँ। मैं केवल आत्मा हूँ। यह ही मेरा सच्चा स्वरुप हैं।
मनुष्य शरीर के बिना और कोई भी शरीर में इसकी प्राप्ति असंभव हैं। ईस स्थिति की प्राप्ति तत्व ज्ञान से होती हैं। और वह विवेक , वैराग्य , ईश्वर की भक्ति , सद्विचर , सदाचार आदि के सेवन से होती हैं। और इन सब लक्षणों का होना ईस घोर कलियुग में ईश्वर की दया के बिना असंभव हैं।

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क्यों होती है हमें एक नेता की जरूरत?

नेता को कार्यों को सम्भव बनाना चाहिए

नेतृत्व मुख्य रूप से कार्यों को करने या संभव बनाने का विज्ञान है। लेकिन मुझे लगता है कि हमारे देश में स्थिति उल्टी है। यहां अगर आप काम को होने से रोक सकते हैं तो आप नेता बन सकते हैं। अगर आप काम-काज ठप्प करा सकते हैं, शहर बंद कर सकते हैं, सडक़ रोको, रेल रोको जैसे आंदोलन सफल करा सकते हैं, तो इसका मतलब है कि आप नेता बन सकते हैं। दुर्भाग्य की बात है कि देश को रोकने की कला नेता बना रही है।

नेता के पास खुद से भी बड़ा लक्ष्य होना चाहिए

आखिर नेता बनने का मतलब क्या है? कोई भी शख्स तब तक खुद को नेता नहीं कह सकता, जब तक कि उसके जीवन में कोई ऐसा लक्ष्य न हो जो उससे भी बड़ा हो।
नेता की उपस्थिति इसलिए जरूरी हो जाती है, क्योंकि लोग सामूहिक रूप से जहां पहुंचना चाहते हैं, वहां पहुंच नहीं पा रहे। वे पहुंचना तो चाह रहे हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि वहां तक पहुंचा कैसे जाए।
अपनी व्यक्तिगत जीवन-यापन की चिंताओं से परे जाकर वह जीवन को एक बड़े फ लक पर देख रहा होता है। नेता का मतलब है: एक ऐसा व्यक्ति जो उन चीजों को देख और कर सकता है, जो दूसरे लोग खुद के लिए नहीं कर सकते। ऐसा न हो तो आपको नेता की जरूरत ही नहीं है। अगर एक नेता भी वही चीजें कर रहा है, जो हर कोई कर रहा है तो आपको नेता की जरूरत ही नहीं है। अगर उसकी भी वही सोच है जो हर किसी की है तो आपको नेता की जरूरत ही नहीं है। तब तो नेताओं के बिना हम और बेहतर कर सकते हैं। नेता की उपस्थिति इसलिए जरूरी हो जाती है, क्योंकि लोग सामूहिक रूप से जहां पहुंचना चाहते हैं, वहां पहुंच नहीं पा रहे। वे पहुंचना तो चाह रहे हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि वहां तक पहुंचा कैसे जाए। इसीलिए एक नेता जरूरी हो जाता है।

नेता का व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढना

व्यक्ति नेता तब बनता है, जब वह अपनी व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढक़र सोचने लगता है, महसूस करने लगता है, और कार्य करने लगता है।
व्यक्ति नेता तब बनता है, जब वह अपनी व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढक़र सोचने लगता है, महसूस करने लगता है, और कार्य करने लगता है।
ऐसा कई बार वह किसी बड़े स्तर पर हो रहे अन्याय की वजह से, तो कई बार संघर्ष के पलों में वह अपनी व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढ़ जाता है। कई बार कुछ लोगों के भीतर की करुणा इतनी शक्तिशाली हो जाती है कि वे अपनी सीमाओं से परे जाकर सोचने लगते हैं और खुद को ऐसे कामों और विचारों के साथ जोड़ लेते हैं जो उनके निजी स्वार्थों से संबंधित नहीं होते। या फिर कोई इंसान निजी महत्वाकांक्षा के कारण भी नेता बन सकता है। शक्तिशाली बनने की उसकी प्रबल महत्वाकांक्षा उसे आगे बढ़ाती है और वह नेता बन जाता है। कई बार किसी खास परिवार में जन्म लेने से भी आप नेता हो जाते हैं।

नेता के लिए भौतिकता से परे का अनुभव जरुरी है

लेकिन कोई शख्स सही अर्थों में तब तक नेता बन ही नहीं सकता जब तक उसके जीवन का अनुभव और जीवन को देखने का तरीका उसकी व्यक्तिगत सीमाओं से परे न चला जाए। यानी नेता बनना या कहें नेतृत्व एक स्वाभाविक प्रक्रिया तब तक नहीं होगी, जब तक कि वह जीवन को देखने, समझने व महसूस करने के तरीके में एक व्यक्ति की सीमाओं से परे नहीं चला जाता।
अगर हमें आध्यात्मिक तत्वों को मानवीय अनुभव में लाए बिना नेता पैदा करने हैं तो यह एक जबरदस्ती वाली बात होगी। जब मैं आध्यात्मिक तत्वों को जीवन के अनुभव में लाने की बात कहता हूं तो मैं किसी धार्मिक समूह में शामिल होने की बात नहीं कर रहा।
अगर किसी तरह से आपने जीवन को भौतिकता की सीमाओं से परे महसूस करना शुरु कर दिया, तो आपमें बिना किसी खास कोशिश के, सहज रूप से नेतृत्व का गुण खिल उठेगा। क्योंकि तब आपका सरोकार केवल उन भौतिक सीमाओं से नहीं रह जाता, जिनसे आपके ‘मैं’ की पहचान जुड़ी हुई है। हम ऐसा होने का इंतजार कर सकते हैं कि अचानक कभी ऐसा हो जाए। कभी ऐसा हो सकता है कि यह अपने आप ही आपके साथ हो जाए। अगर हमें आध्यात्मिक तत्वों को मानवीय अनुभव में लाए बिना नेता पैदा करने हैं तो यह एक जबरदस्ती वाली बात होगी। जब मैं आध्यात्मिक तत्वों को जीवन के अनुभव में लाने की बात कहता हूं तो मैं किसी धार्मिक समूह में शामिल होने की बात नहीं कर रहा। मैं बस आपकी सोच और अनुभव के फलक को विस्तृत करने की बात कर रहा हूं। अगर आप अपनी अनुभूतियों के फलक का विस्तार नहीं करते हैं, तो नेतृत्व आपके लिए एक थोपी गई चीज होगी। यह फि र किसी न किसी चीज से संचालित हो रही होगी, यह कोई स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं होगी। अगर नेता बनना एक स्वाभाविक घटना की तरह घटित हो, तो नेतृत्व आपके भीतर खुद ही प्रकट होने लगेगा, और वह भी उसी हद तक जिस हद तक जरुरी हो। जरुरत से आगे जाकर नेतृत्व खुद को आप पर नहीं थोपेगा। अगर कोई बिना आध्यात्मिकता के किसी नेतृत्व की स्थिति में पहुंचता है तो वह बड़ी आसानी से एक तानाशाह में तब्दील हो सकता है। सौभाग्य से हमेशा ऐसा नहीं होता है।

आम का इतिहास

पुर्तग़ाली व्यापारी भारत में आम लेकर आए थे। इसके बीजों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में कठिनाई के कारण संभवतः 1700 ई. में ब्राज़ील मे...