Sunday, 30 April 2017

हम एक असफल समाज क्यूँ हैं?


 हम एक असफल समाज क्यूँ हैं?
अगर आप समाज के बारे में सोचें तो बहुत से प्रश्न आपके सामने आकर खड़े हो जाते हैं लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न में यह समझता हूँ यह है कि हम समाज के रूप में असफल क्यूँ हैं? समाज एक व्यक्ति नहीं है अगर समाज की पहचान नहीं बन पाई या समाज की प्रगति नहीं हुई तो यह पूरे समुदाय पूरे समाज की असफलता है, यह हमारे बड़े बुजुर्गों की असफलता है की वे नई पीढ़ी के लिए आदर्श स्थापित नहीं कर पाए, कोई मार्ग नहीं दिखा पाए और यह वर्तमान पीढ़ी की भी असफलता है की हम भावी पीढ़ी के लिए कोई आदर्श स्थापित करने के प्रति चिंतित नहीं हैं |
हमें यह सोचना ही होगा कि अगर समाज के किसी व्यक्ति को किसी प्रकार की प्रतिकूल स्थिति का सामना करना पड़े तो वह समाज में किसका सहारा ढूंढे? समाज के बच्चों को अगर अपनी शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता की आवश्यकता पड़ जाये तो वह सहायता के लिए किस से उम्मीद लगाये? समाज में बहुत से ऐसे परिवार हैं जो पुश्तेनी कार्य करके अपना परिवार पालन का कर रहे हैं और कई परिवार ऐसे भी हैं जहाँ एक व्यक्ति की मजदूरी से पूरा परिवार पलता है ऐसे में अगर घर का मुखिया पर कोई कठिनाई आ पड़े तो वह सहायता के लिए किसे पुकारे? गरीब परिवारों केलिए मजदूरी करके परिवार को पालना बहुत कठिन काम है ऐसे में अगर समाज से उसे बच्चों की शिक्षा के लिए, बीमारी में दवाई के लिए, परिवार में मंगलकार्य होने पर किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता हो तो वह किसका मुह देखे ?
सैकड़ों सालों में भी अगर हम अपने समाज में इस तरह की व्यवस्थाएं नहीं कर पाए तो यह हमारी व्यक्तिगत और सामूहिक असफलता है | यह समाज के उन जिम्मेदार लोगों की असफलता है जो वर्षों से समाज के पदाधीश बन के तो बेठे रहे लेकिन समाज के लोगों की सुध लेने की जिन्हें कभी फुर्सत नहीं मिली, अपने पदों पर बने रहने के लिए जमीन आसमान एक कर देने वाले जिम्मेदार लोगों की असफलता है यह कि उन्हें कई दशकों बाद भी समाज के लिए कुछ ना कर पाने का कोई अहसास नहीं है | क्या यह जिम्मेदार लोगों की मात्र लापरवाही है या कुछ और बात है? आज भी किसी को समाज के लोगों को सामाजिक तकलीफों की उन्हें दूर करने की चिंता नहीं है सब अपनी अपनी ढपली बजने में अपना अपना राग अलापने में लगे हैं और समाज की वास्तविक समस्याएं यथावत सर उठाये खड़ी हैं और निकट भविष्य में इन समस्याओं के दूर होने की कोई उम्मीद भी नजर नहीं आती | जब कोई समस्याओं के बारे में, समाज के लोगों की उम्मीद के बारे में विचार ही नहीं करना चाहता तो इन समस्याओं के
निराकरण की उम्मीद कैसे करोगे |
समाज को सही दिशा देने की जिम्मेदारी किसकी ?
लोगों की प्राथमिकताओं में समाज की प्रगति, समाज के कमजोर नागरिकों के कल्याण की कोई योजनायें ही शामिल नहीं हैं तो लोगों के कल्याण के लिए हम करेंगे भी तो क्या? जिम्मेदार लोगों के पास कोई विचार ही नहीं है की वे समाज को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं | कभी किसी सार्वजनिक बातचीत में लोगों के लिए कल्याणकारी योजना बनाने की बात नहीं उठी, कभी बच्चों की शिक्षा की चिंता नहीं जताई गई, समाज के लोगों केलिए बीमारी में दवाई, इलाज की व्यवस्था मुद्दा नहीं बना, संकटकाल में किस तरह की मदद समाज के लोगों के लिए उपलब्ध होनी चाही किसी ने नहीं सोचा | हमारी सामाजिक चर्चाओं का विषय कभी यह नहीं रहा की किस तरह समाज के बच्चों को अन्य समाज के बच्चों के सामान प्रतियोगी माहोल दिया जाये जिससे वे रोजगार के नए क्षेत्रों की और अग्रसर हो सकें | न कला को प्रोत्साहन की बात होती है कभी न रोजगार, व्यापार-व्यवसाय के नए तरीकों से युवाओं को अवगत करने की कोशिश होती है और ना हम युवाओं को सामाजिक स्तर पर कोई मोका देना चाहते हैं आखिर समाज के रूप में हम असफल ना हो तो और क्या हो!
जब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों की वजह दूसरों को मानते है, तब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों को मिटा नहीं सकते  |

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