"मनष्य एक सामाजिक प्राणी है ।" -----ऐसा प्रसिद्ध दार्शनिक 'अरस्तु ' ने कहा है।
परंतु मनुष्य जितना सामाजिक है, उतना ही वैयक्तिक भी । इसलिए एक तरफ सामाजिक व्यथा से जाग्रत आत्मा वाला व्यक्ति यथार्थवादी हो जाता है; वहीं दूसरी तरफ सम्पन्न परिस्थिति में अपनी भावनाओं के मनोहर कोष से चेतन आत्मा वाला व्यक्ति भावना- प्रधान और कल्पना प्रधान हो जाता है ।
परन्तु यह भी सत्य है कि जब कोई भावना प्रधान प्राणी बाह्य वास्तविकता की ओर मुड़ता है तो अपनी सहज ईमानदारी से वशिभूत होकर ,उसके प्रति अपने को जिम्मेवार ठहराता है और उसके बाद ही वह "सृजन"हो पाता है जिसे आदर्शवादी कहा जाता है। आदर्शवादी सर्जक जीवन पर सोचने लगता है , जीवन की ट्रेजडीज , उसके विरोध और विसंगतियाँ , उसके मन में कहीं गहराई में बैठ जाती हैं ।वह उन विचारों से किसी प्रकार छुटकारा नहीं पा पाता । वह उन पर सोचता है,कुछ निष्कर्षों पर पहुँचता है और उन सबका चित्रांकन करता है । यह विशेष प्रकार का सर्जक जीवन को समस्त रूप में ग्रहण करने की चेष्टा करता है । यही उसकी विशेषता है।
उदाहरणतः , 'कबीर' जब तक अपने रंग में मस्त होकर जीवन का ज्ञान सुनाते हैं, तभी तक वह सर्जक कलाकार दिखते हैं । पर जैसे ही 'कबीर ' अपने बौद्धिक -दार्शनिक निर्गुणवाद के प्रति आस्था रखने का आग्रह करते दिखते है; उनकी सृजनात्मकता खण्डित होने लगती है और वे सृजन छोड़ दर्शन के दुरूह क्षेत्र में प्रवेश कर जाते है, जिसके अलग नियम है ।
परंतु मनुष्य जितना सामाजिक है, उतना ही वैयक्तिक भी । इसलिए एक तरफ सामाजिक व्यथा से जाग्रत आत्मा वाला व्यक्ति यथार्थवादी हो जाता है; वहीं दूसरी तरफ सम्पन्न परिस्थिति में अपनी भावनाओं के मनोहर कोष से चेतन आत्मा वाला व्यक्ति भावना- प्रधान और कल्पना प्रधान हो जाता है ।
परन्तु यह भी सत्य है कि जब कोई भावना प्रधान प्राणी बाह्य वास्तविकता की ओर मुड़ता है तो अपनी सहज ईमानदारी से वशिभूत होकर ,उसके प्रति अपने को जिम्मेवार ठहराता है और उसके बाद ही वह "सृजन"हो पाता है जिसे आदर्शवादी कहा जाता है। आदर्शवादी सर्जक जीवन पर सोचने लगता है , जीवन की ट्रेजडीज , उसके विरोध और विसंगतियाँ , उसके मन में कहीं गहराई में बैठ जाती हैं ।वह उन विचारों से किसी प्रकार छुटकारा नहीं पा पाता । वह उन पर सोचता है,कुछ निष्कर्षों पर पहुँचता है और उन सबका चित्रांकन करता है । यह विशेष प्रकार का सर्जक जीवन को समस्त रूप में ग्रहण करने की चेष्टा करता है । यही उसकी विशेषता है।
उदाहरणतः , 'कबीर' जब तक अपने रंग में मस्त होकर जीवन का ज्ञान सुनाते हैं, तभी तक वह सर्जक कलाकार दिखते हैं । पर जैसे ही 'कबीर ' अपने बौद्धिक -दार्शनिक निर्गुणवाद के प्रति आस्था रखने का आग्रह करते दिखते है; उनकी सृजनात्मकता खण्डित होने लगती है और वे सृजन छोड़ दर्शन के दुरूह क्षेत्र में प्रवेश कर जाते है, जिसके अलग नियम है ।
इस बारे में आप क्या सोचते हैं? क्योकि
इस दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं, हम वो सब कर सकते है, जो हम सोच सकते है और हम वो सब सोच सकते है, जो आज तक हमने नहीं सोचा |

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