Wednesday, 3 April 2019

आम का इतिहास



पुर्तग़ाली व्यापारी भारत में आम लेकर आए थे। इसके बीजों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में कठिनाई के कारण संभवतः 1700 ई. में ब्राज़ील में इसे लगाए जाने से पहले पश्चिमी गोलार्द्ध इससे लगभग अपरिचित ही था, 1740 में यह वेस्टइंडीज़ पहुंचा। कई नवाबों और राजाओं के नामों पर भी इसका नामकरण हुआ। आम का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। डी कैडल (सन्‌ 1844) के अनुसार 'आम्र' प्रजाति (मैंजीफ़ेरा जीनस) संभवत: बर्मा, स्याम तथा मलाया में उत्पन्न हुई, परंतु भारत का आम, मैंजीफ़ेरा इंडिका, जो यहाँ, बर्मा औरपाकिस्तानमें जगह जगह स्वयं (जंगली अवस्था में) होता है, बर्मा-असम अथवा असम में ही पहले पहल उत्पन्न हुआ होगा। भारत के बाहर लोगों का ध्यान आम की ओर सर्वप्रथम संभवत: बुद्धकालीन प्रसिद्ध यात्री,ह्वेन त्सांग(632-45) ने आकर्षित किया।प्रजातियाँ उद्यान में लगाए जाने वाले आम की लगभग 1400 जातियों से हम परिचित हैं। इनके अतिरिक्त कितनी ही जंगली और बीजू किस्में भी हैं। गंगोली आदि (सन्‌ 1955) ने210 बढ़िया कलमी जातियों का सचित्र विवरण दिया है। विभिन्न प्रकार के आमों के आकार और स्वाद में बड़ा अंतर होता है। कुछ बेर से भी छोटे तथा कुछ, जैसे -सहारनपुर का 'हाथीझूल', भार में दो, ढाई सेर तक होते हैं। कुछ अत्यंत खट्टे अथवा स्वादहीन या चेप से भरे होते हैं, परंतु कुछ अत्यंत स्वादिष्ट और मधुर होते हैं।विदेशियों द्वारा प्रशंसित 'फ्ऱायर' (सन्‌ 1673) ने आम को आडू और खूबानी से भी रुचिकर कहा है। 'हैमिल्टन' (सन्‌ 1727) ने गोवा के आमों को बड़े, स्वादिष्ट तथा संसार के फलों में सबसे उत्तम और उपयोगी बताया है। इस फल का नाम मैंगो, जिससे यह अंग्रेज़ी तथा स्पेनिशभाषी देशों में पहचाना जाता है। तमिल भाषा में मैन-के या मैन-गे से उत्पन्न हुआ है। पुर्तग़ालियों ने पश्चिम भारत में बसने पर मैंगा के रूप में अपनाया था। आम को अलग-अलग नाम दिए गए जैसे लंगड़ा, दशहरी, अलफॉंसो और चौंसा।भारत में आमभारत में, पहाड़ी क्षेत्रों को छोड़ कर आम लगभग सभी स्थानों पर पैदा होता है। हमारे यहाँ आम की सैंकड़ों किस्में है। यह आकार और रंगों में अलग-अलग होते हैं। भारत में आम की फ़सल अति प्राचीनकाल से उगाई जाती रही है। आम को अनंत समय से भारत में उगाया जाता रहा है। विश्व के अनेक देशों में आम की अलग-अलग जाति होती है। फिर भी हिंदुस्तान का प्रसिद्ध फल आम ही है। आँकड़ों के मुताबिक इस समय भारत में प्रतिवर्ष एक करोड़ टन आम पैदा होता है जो दुनिया के कुल उत्पादन का 52 फ़ीसदी है। स्वाद, स्वास्थ्य एवं बल संवर्धन की दृष्टि से आम सभी फलों में आगे है। आम भिन्न-भिन्न जाति के होते हैं। किन्तु सभी आमों के गुण प्रायः एक से ही होते हैं।आम विक्रेता आम भारत के लोकगीतों और धार्मिक अनुष्ठानों से अनिवार्य रूप से जुड़ा है। कवी कालीदास ने इसकी प्रशंसा में गीत लिखे हैं।अलेक्ज़ॅन्डर ने इसका स्वाद चखा है और साथ ही चीनी धर्म यात्री हुएन-सांगने भी।मुग़ल बादशाह अकबर ने बिहार के दरभंगा में 1,00,000 से अधिक आम के पौधे रोपे थे, जिसे अब 'लाखी बाग़' के नाम से जाना जाता है। स्वयं बुद्ध को एक आम्रकुंज भेंट किया गया था, ताकि वह उसकी छाँव में विश्राम कर सकें।

     - प्रणव मिश्र

Wednesday, 19 July 2017

भारत की बदहाल शिक्षा व्यवस्था

-- बदहाल शिक्षा व्यवस्था से मेरा मतलब सरकार या किसी पर दोषारोपण नहीं है !
-- उत्तरप्रदेश में मंत्रियों , अधिकारियों , न्यायाधीशों और सरकार से वेतन पाने वाले सभी कर्मचारियों के बच्चों को परिषदीय प्राथमिक स्कूलों में पढ़ना होगा अनिवार्य ।

भारत में आजकल न तो शिक्षा की स्थिति सही है और न ही शिक्षक की , वर्तमान समय में जो शिक्षक बन रहे है उन्हें विषय का सही ज्ञान ही नहीं है और वह सिर्फ अपनी कुर्सी का मजा ले रहे है कदाचित कोई शिक्षक इस बदहाल व्यवस्था के प्रति आवाज उठाता है तो उसे मुँह की खानी पड़ती है ऐसे ही एक कहानी सुल्तानपुर की है वर्ष 2015 के जुलाई माह में उत्तर प्रदेश के प्राथमिक स्कूलों में शिक्षा की बदहाल स्थिति के खिलाफ आवाज उठाने वाले एक शिक्षक को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। राज्य में शिक्षा की स्थिति में सुधार लाने के इरादे से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने वाले सुल्तानपुर के शिक्षक शिव कुमार पाठक को सरकार ने नौकरी से बर्खास्त कर दिया था । अब जब कोई सुधार करने की बात करता है तो उसे या तो समाज स्वीकार नहीं करता या फिर सरकार उस पर अपना चाबुक चलाती है , बदहाल शिक्षा व्यवस्था से मेरा मतलब सरकार या किसी पर दोषारोपण का नहीं है अपितु हमी उसके जिम्मेदार है खैर इसी घटनाक्रम में एक अजब सी मोड़ आयी इलाहाबाद उच्च न्यायलय ने अपने एक फैसले में यह आदेश दिया है की उत्तरप्रदेश में मंत्रियों , अधिकारियों , न्यायाधीशों और सरकार से वेतन पाने वाले सभी कर्मचारियों के बच्चों को परिषदीय प्राथमिक स्कूलों में पढ़ना अनिवार्य होगा । खैर नारायण वास्तव में इस फैसले का कितना अनुपालन हुआ आप सभी जानते ही है , भारत में व्याप्त इस बदहाल व्यवस्था को बदलने के लिए हर किसी को शिक्षा के प्रति जिम्मेदार  होना चाहिए बाकि आपके सुझाव आमंत्रित है ।

प्रणव मिश्र - स्वतंत्र पत्रकार

Tuesday, 13 June 2017

WHO I AM ? मैं कौन हूँ ?

नाम (Name) 

मुझे आज लोग भोला कहते हैं। भोला मेरा एक नाम हैं। लेकिन जब प्रसव हुआ तब मेरा कोई नाम नहीं था। लेकिन तब भी मेरा अस्तित्व था। मेरे घर वालों ने थोड़े ही दिनों के बाद मेरा नामकरण किया। उस वक्त अगर मेरे घर वालों  ने मेरा नाम भोला की जगह अगर मोला रखा होता तो आज लोग मुझे मोला कहतें। मैं न तो गर्भ में भोला था और ना ही मेरे ईस शरीर के नाश हो जाने के बाद भोला रहूँगा। यह तो केवल मेरे घर वालों ने निर्देष किया हुआ एक सांकेतिक नाम हैं। जो जब चाहे बदला जा सकता हैं। जो विवेकवान पुरुष इस रहष्य को समज लेता है की में एक नाम नहीं हूँ ,में अनामी हूँ। इस से वह इस नाम की निंदा से कभी भी सुखी या दुखी नहीं होता हैं। इस बात से यह सिध्ध  होता हैं की में एक नाम नहीं हूँ।

शरीर (Body) :

 शरीर एक जड हैं। मैं एक चेतन हूँ। शरीर क्षय , वृध्धि , उत्पत्ति  और विनाश के स्वभाव वाला हैं। मैं इन सब चीजों से सर्वदा परे हूँ। बचपन में मेरे शरीर का स्वरुप कुछ और था।  ऐसे ही युवावस्था और वृध्धावस्था में शरीर का स्वरुप कुछ अलग हैं। परन्तु इन तीनो अवस्थाओं को जाननेवाला में एक ही हूँ। इस लिए मैं यह शरीर नहीं हूँ। मैं शरीर का ज्ञाता हूँ।

इन्द्रियां (Senses) 

मैं इन्द्रिय भी नहीं हूँ। हाथ और पैर अगर कट जाए , आँखें नष्ट हो जाए , कान बेहरे हो जाते हैं , तब भी मैं जहाँ का तहां पूर्ववत् ही हूँ। मैं कभी मरता नहीं हूँ। अगर में इन्द्रिय होता तो उसके विनाश के साथ मेरा भी विनाश संभव होता। उसकी हानि के साथ मुझे भी हानि होती। इसलिए मैं जड इन्द्रिय नहीं हूँ , लेकिन इन्द्रियों का द्रष्टा या ज्ञाता हूँ। मैं भिन्न हूँ।

मन (Mind:

मैं मन भी नहीं हूँ। नींद में मन रहेता नहीं हैं परन्तु मैं रहता हूँ। इस लिए नींद में से जगने के बाद मुझे इस बात का ज्ञान होता हैं की में शांति से सो रहा था। दूसरी द्रष्टि से भी मन के अनुपस्थित काल में मेरी जीवित सत्ता प्रसिध्ध हैं। मन विकारी हैं। मन में होते विकारो का मैं ज्ञाता हूँ। खान – पान – स्नान आदि के समय अगर मेरा ध्यान अगर दूसरी जगह पर रहा तो इन कामो में कोई न कोई भूल हो जाती हैं। फिर में सचेत हो कर कहता हूँ की मेरा मन किसी दूसरी जगह पर था इस लिए मुझसे गलती हो गयी। क्योंकि केवल शरीर और इन्द्रियों से मन के बिना सावधानी पूर्वक काम नहीं हो सकता। मन चंचल हैं पर मैं स्थिर हूँ। अचल हूँ। मन कहीं भी रहे , कुछ भी करता रहे मैं उसको जानता हूँ। इसलिए मैं मन का ज्ञाता हूँ। मन नहीं हूँ।

बुध्धि (intelligence) :

मैं बुध्धि भी नहीं हूँ। क्योंकि बुध्धि भी क्षय-वृध्धि के स्वभाव वाली हैं। मैं क्षय-वृध्धि से सर्वथा परे हूँ। बुध्धि में मंदता , तीव्रता , पवित्रता , मलिनता , स्थिरता और अस्थिरता जैसे विकार होते हैं। परन्तु मैं इन सब से परे हूँ और सब स्थितिओं से वाकेफ हूँ। बुध्धि कब और कौन सा विचार कर रही हैं , क्या निर्णय कर रही हैं वह मैं जानता हूँ। बुध्धि द्रश्य हैं और मैं एक द्रष्टा हूँ। बुध्धि से मेरा पृथकत्व सिध्ध हैं। इस लिए में बुध्धि नहीं हूँ।
इस तरह मैं नाम , शरीर , इन्द्रिय , मन और बुध्धि नहीं हूँ। इन सब से सर्वथा अतीत , पृथक , चेतन , द्रष्टा , साक्षी , सब का ज्ञाता , सत्य , नित्य , अविनाशी , अकारी , अविकारी , अक्रिय , अचल , सनातन , अमर और समस्त सुख – दुःख से रहित केवल शुध्ध आनंदमय आत्मा हूँ। मैं केवल आत्मा हूँ। यह ही मेरा सच्चा स्वरुप हैं।
मनुष्य शरीर के बिना और कोई भी शरीर में इसकी प्राप्ति असंभव हैं। ईस स्थिति की प्राप्ति तत्व ज्ञान से होती हैं। और वह विवेक , वैराग्य , ईश्वर की भक्ति , सद्विचर , सदाचार आदि के सेवन से होती हैं। और इन सब लक्षणों का होना ईस घोर कलियुग में ईश्वर की दया के बिना असंभव हैं।

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क्यों होती है हमें एक नेता की जरूरत?

नेता को कार्यों को सम्भव बनाना चाहिए

नेतृत्व मुख्य रूप से कार्यों को करने या संभव बनाने का विज्ञान है। लेकिन मुझे लगता है कि हमारे देश में स्थिति उल्टी है। यहां अगर आप काम को होने से रोक सकते हैं तो आप नेता बन सकते हैं। अगर आप काम-काज ठप्प करा सकते हैं, शहर बंद कर सकते हैं, सडक़ रोको, रेल रोको जैसे आंदोलन सफल करा सकते हैं, तो इसका मतलब है कि आप नेता बन सकते हैं। दुर्भाग्य की बात है कि देश को रोकने की कला नेता बना रही है।

नेता के पास खुद से भी बड़ा लक्ष्य होना चाहिए

आखिर नेता बनने का मतलब क्या है? कोई भी शख्स तब तक खुद को नेता नहीं कह सकता, जब तक कि उसके जीवन में कोई ऐसा लक्ष्य न हो जो उससे भी बड़ा हो।
नेता की उपस्थिति इसलिए जरूरी हो जाती है, क्योंकि लोग सामूहिक रूप से जहां पहुंचना चाहते हैं, वहां पहुंच नहीं पा रहे। वे पहुंचना तो चाह रहे हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि वहां तक पहुंचा कैसे जाए।
अपनी व्यक्तिगत जीवन-यापन की चिंताओं से परे जाकर वह जीवन को एक बड़े फ लक पर देख रहा होता है। नेता का मतलब है: एक ऐसा व्यक्ति जो उन चीजों को देख और कर सकता है, जो दूसरे लोग खुद के लिए नहीं कर सकते। ऐसा न हो तो आपको नेता की जरूरत ही नहीं है। अगर एक नेता भी वही चीजें कर रहा है, जो हर कोई कर रहा है तो आपको नेता की जरूरत ही नहीं है। अगर उसकी भी वही सोच है जो हर किसी की है तो आपको नेता की जरूरत ही नहीं है। तब तो नेताओं के बिना हम और बेहतर कर सकते हैं। नेता की उपस्थिति इसलिए जरूरी हो जाती है, क्योंकि लोग सामूहिक रूप से जहां पहुंचना चाहते हैं, वहां पहुंच नहीं पा रहे। वे पहुंचना तो चाह रहे हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि वहां तक पहुंचा कैसे जाए। इसीलिए एक नेता जरूरी हो जाता है।

नेता का व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढना

व्यक्ति नेता तब बनता है, जब वह अपनी व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढक़र सोचने लगता है, महसूस करने लगता है, और कार्य करने लगता है।
व्यक्ति नेता तब बनता है, जब वह अपनी व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढक़र सोचने लगता है, महसूस करने लगता है, और कार्य करने लगता है।
ऐसा कई बार वह किसी बड़े स्तर पर हो रहे अन्याय की वजह से, तो कई बार संघर्ष के पलों में वह अपनी व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढ़ जाता है। कई बार कुछ लोगों के भीतर की करुणा इतनी शक्तिशाली हो जाती है कि वे अपनी सीमाओं से परे जाकर सोचने लगते हैं और खुद को ऐसे कामों और विचारों के साथ जोड़ लेते हैं जो उनके निजी स्वार्थों से संबंधित नहीं होते। या फिर कोई इंसान निजी महत्वाकांक्षा के कारण भी नेता बन सकता है। शक्तिशाली बनने की उसकी प्रबल महत्वाकांक्षा उसे आगे बढ़ाती है और वह नेता बन जाता है। कई बार किसी खास परिवार में जन्म लेने से भी आप नेता हो जाते हैं।

नेता के लिए भौतिकता से परे का अनुभव जरुरी है

लेकिन कोई शख्स सही अर्थों में तब तक नेता बन ही नहीं सकता जब तक उसके जीवन का अनुभव और जीवन को देखने का तरीका उसकी व्यक्तिगत सीमाओं से परे न चला जाए। यानी नेता बनना या कहें नेतृत्व एक स्वाभाविक प्रक्रिया तब तक नहीं होगी, जब तक कि वह जीवन को देखने, समझने व महसूस करने के तरीके में एक व्यक्ति की सीमाओं से परे नहीं चला जाता।
अगर हमें आध्यात्मिक तत्वों को मानवीय अनुभव में लाए बिना नेता पैदा करने हैं तो यह एक जबरदस्ती वाली बात होगी। जब मैं आध्यात्मिक तत्वों को जीवन के अनुभव में लाने की बात कहता हूं तो मैं किसी धार्मिक समूह में शामिल होने की बात नहीं कर रहा।
अगर किसी तरह से आपने जीवन को भौतिकता की सीमाओं से परे महसूस करना शुरु कर दिया, तो आपमें बिना किसी खास कोशिश के, सहज रूप से नेतृत्व का गुण खिल उठेगा। क्योंकि तब आपका सरोकार केवल उन भौतिक सीमाओं से नहीं रह जाता, जिनसे आपके ‘मैं’ की पहचान जुड़ी हुई है। हम ऐसा होने का इंतजार कर सकते हैं कि अचानक कभी ऐसा हो जाए। कभी ऐसा हो सकता है कि यह अपने आप ही आपके साथ हो जाए। अगर हमें आध्यात्मिक तत्वों को मानवीय अनुभव में लाए बिना नेता पैदा करने हैं तो यह एक जबरदस्ती वाली बात होगी। जब मैं आध्यात्मिक तत्वों को जीवन के अनुभव में लाने की बात कहता हूं तो मैं किसी धार्मिक समूह में शामिल होने की बात नहीं कर रहा। मैं बस आपकी सोच और अनुभव के फलक को विस्तृत करने की बात कर रहा हूं। अगर आप अपनी अनुभूतियों के फलक का विस्तार नहीं करते हैं, तो नेतृत्व आपके लिए एक थोपी गई चीज होगी। यह फि र किसी न किसी चीज से संचालित हो रही होगी, यह कोई स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं होगी। अगर नेता बनना एक स्वाभाविक घटना की तरह घटित हो, तो नेतृत्व आपके भीतर खुद ही प्रकट होने लगेगा, और वह भी उसी हद तक जिस हद तक जरुरी हो। जरुरत से आगे जाकर नेतृत्व खुद को आप पर नहीं थोपेगा। अगर कोई बिना आध्यात्मिकता के किसी नेतृत्व की स्थिति में पहुंचता है तो वह बड़ी आसानी से एक तानाशाह में तब्दील हो सकता है। सौभाग्य से हमेशा ऐसा नहीं होता है।

Tuesday, 2 May 2017

पर्यावण और जीवन का अटूट संबंध

विश्वपर्यावरणदिवस संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रकृति को समर्पित दुनियाभर में मनाया जाने वाला सबसे बड़ा उत्सव है। पर्यावरण और जीवनका अटूट संबंध है फिर भी हमें अलग से यह दिवस मनाकर पर्यावरण के संरक्षण, संवर्धन और विकास का संकल्प लेने की आवश्यकता है। यह बात चिंताजनक ही नहीं, शर्मनाक भी है। पर्यावरण प्रदूषण की समस्या पर सन् 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्टॉकहोम (स्वीडन) में विश्व भर के देशों का पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया। इसमें 119 देशों ने भाग लिया और पहली बार एक ही पृथ्वी का सिद्धांत मान्य किया। इसी सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP)का जन्म हुआ तथा प्रति वर्ष 5 जून को पर्यावरण दिवस आयोजित करके नागरिकों को प्रदूषण की समस्या से अवगत कराने का निश्चय किया गया। तथा इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाते हुए राजनीतिक चेतना जागृत करना और आम जनता को प्रेरित करना था। उक्त गोष्ठी में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 'पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति एवं उसका विश्व के भविष्य पर प्रभाव' विषय पर व्याख्यान दिया था। पर्यावरण-सुरक्षा की दिशा में यह भारत का प्रारंभिक कदम था। तभी से हम प्रति वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते आ रहे हैं।पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 19 नवंबर 1986 से पर्यावरण संरक्षण अधिनियम लागू हुआ। उसके जल, वायु, भूमि - इन तीनों से संबंधित कारक तथा मानव, पौधों, सूक्ष्म जीव, अन्य जीवित पदार्थ आदि पर्यावरण के अंतर्गत आते हैं।

Monday, 1 May 2017

मजदूरों का शोषण मानवता का उपहास- 1 मई पे खास

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हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय मजदूरदिवस मई महीने की पहली तारीख को मनाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस को 'मई दिवस' भी कहकर बुलाया जाता है। अमेरिका में 1886 में जब मजदूर संगठनों द्वारा एक शिफ्ट में काम करने की अधिकतम सीमा 8 घंटे करने के लिए हड़ताल की जा रही थी तो इस हड़ताल के दौरान एक अज्ञात शख्स ने शिकागो के हेय मार्केट में बम फोड़ दिया, इसी दौरान पुलिस ने मजदूरों पर गोलियां चला दीं जिसमें 7 मजदूरों की मौत हो गई। इस घटना के कुछ समय बाद ही अमेरिका ने मजदूरों के एक शिफ्ट में काम करने की अधिकतम सीमा 8 घंटे निश्चित कर दी थी। तभी से अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस 1 मई को मनाया जाता है। इसे मनाने की शुरुआत शिकागो में ही 1886 से की गई थी। मौजूदा समय में भारत सहित विश्व के अधिकतर देशों में मजदूरों के 8घंटे काम करने का संबंधित कानून बना हुआ है। अगर भारत की बात की जाएतो भारत में मजदूर दिवस के मनाने की शुरुआत चेन्नई में 1 मई 1923 से हुई।'अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस' लाखों मजदूरों के परिश्रम,दृढ़ निश्चयऔरनिष्ठा का दिवस है। एक मजदूर देश के निर्माण में बहुमूल्य भूमिका निभाता है और उसका देश के विकास में अहम योगदान होता है। किसी भी समाज, देश, संस्था और उद्योग में काम करने वाले श्रमिकों की अहम भूमिका होती है। मजदूरों के बिना किसी भी औद्योगिक ढांचे के खड़े होने की कल्पना नहीं की जा सकती इसलिए श्रमिकों का समाज में अपना हीएक स्थान है।लेकिन आज भी देश में मजदूरों के साथ अन्याय और उनका शोषण होता है। आज भारत देश में बेशक मजदूरों के 8 घंटे काम करने का संबंधित कानून लागू हो लेकिन इसका पालन सिर्फ सरकारी कार्यालय ही करते हैं, बल्कि देश में अधिकतर प्राइवेट कंपनियां या फैक्टरियां अब भी अपने यहां काम करने वालों से 12 घंटे तक काम कराते हैं। जो कि एक प्रकार से मजदूरों का शोषण है। आज जरूरत है कि सरकार को इस दिशा मेंएक प्रभावी कानून बनाना चाहिए और उसका सख्ती से पालन कराना चाहिए।भारत देश में मजदूरों की मजदूरी के बारे में बात की जाए तो यह भी एकबहुत बड़ी समस्या है। आज भी देश में कम मजदूरी पर मजदूरों से काम कराया जाता है। यह भी मजदूरों का एक प्रकार से शोषण है। आज भी मजदूरों से फैक्टरियों या प्राइवेट कंपनियों द्वारा पूरा काम लिया जाता है लेकिन उन्हें मजदूरी के नाम पर बहुत कम मजदूरी पकड़ा दी जातीहै जिससे मजदूरों को अपने परिवार का खर्चा चलाना मुश्किल हो जाता है। पैसों के अभाव से मजदूर के बच्चों को शिक्षा से वंचित रहना पड़ताहै। भारत में अशिक्षा का एक कारण मजदूरों को कम मजदूरी दिया जाना भी है।आज भी देश में ऐसे मजदूर हैं, जो 1500-2000 रु. की मासिकमजदूरी पर काम कर रहे हैं। यह एक प्रकार से मानवता का उपहास है। बेशक, इसको लेकर देश में विभिन्न राज्य सरकारों ने न्यूनतम मजदूरी के नियम लागू किए हैं, लेकिन इन नियमों का खुलेआम उल्लंघन होता है और इस दिशा में सरकारों द्वारा भी कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता और न ही कोई कार्रवाई की जाती है।आज जरूरत है कि इस महंगाई के समय में सरकारों को प्राइवेट कंपनियों,फैक्टरियों और अन्य रोजगार देने वाले माध्यमों के लिए एक कानून बनाना चाहिए जिसमें मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी तय की जानी चाहिए। मजदूरी इतनी होनी चाहिए कि जिससे मजदूर के परिवार को भूखा न रहना पड़े और न ही मजदूरों के बच्चों को शिक्षा से वंचित रहना पड़े।आज भी हमारे भारत देश में लाखों लोगों से बंधुआ मजदूरी कराई जाती है। जब किसी व्यक्ति को बिना मजदूरी या नाममात्र पारिश्रमिक के मजदूरी करने के लिए बाध्य किया जाता है या ऐसी मजदूरी कराई जाती है तो वह 'बंधुआ मजदूरी' कहलाती है। अगर देश में कहीं भी बंधुआ मजदूरी कराई जाती है तो वह सीधे-सीधे बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम 1976 का उल्लंघन होगा। यह कानून भारत के कमजोर वर्गोंके आर्थिक और वास्तविक शोषण को रोकने के लिए बनाया गया था लेकिन आज भी जनसंख्या के कमजोर वर्गों के आर्थिक और वास्तविक शोषण को नहीं रोका जा सका है। आज भी देश में कमजोर वर्गों का बंधुआ मजदूरी के जरिए शोषण किया जाताहै, जो कि संविधान के अनुच्छेद 23 का पूर्णत: उल्लंघन है। संविधान की इस धारा के तहत भारत के प्रत्येक नागरिक को शोषण और अन्याय के खिलाफ अधिकार दिया गया है। लेकिन आज भी देश में कुछ पैसोंया नाममात्र के गेहूं, चावल या अन्य खाने के सामान के लिए बंधुआ मजदूरी कराई जाती है, जो कि अमानवीय है। आज जरूरत इस बात की है कि समाज और सरकार को मिलकर बंधुआ मजदूरी जैसी अमानवीयता को रोकने का सामूहिक प्रयास करना चाहिए।आज भी देश में मजदूरी में लैंगिक भेदभाव आम बात है। फैक्टरियों में आज भी महिलाओं को पुरुषों के बराबर वेतन नहीं दिया जाता है। बेशक, महिला या पुरुष फैक्टरियों में समान काम कर रहे हों लेकिन बहुत सी जगह आज भी महिलाओं को समान कार्य हेतु समान वेतन नहीं दिया जाता है।फैक्टरियों में महिलाओं से उनकी क्षमता से अधिक कार्य कराया जाता है। आज भी देश की बहुत सारी फैक्टरियों में महिलाओं के लिए पृथक शौचालय की व्यवस्था नहीं है। महिलाओं से भी 10-12 घंटे तक काम कराया जाता है। आज जरूरत है कि सभी उद्योगों को लैंगिक भेदभाव से बचना चाहिए और महिला श्रमिक से संबंधित कानूनों का कड़ाई से पालन करना चाहिए। इसके साथ ही सभी राज्य सरकारों को महिला श्रमिक से संबंधित कानूनों को कड़ाई से लागू करने के लिए सभी उद्योगों को निर्देशित करना चाहिए। अगर कोई इन कानूनों का उल्लंघन करे तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।आज भारत देश में छोटे-छोटे गरीब बच्चे स्कूल छोड़कर बालश्रम हेतु मजबूर हैं। बाल मजदूरी बच्चों के मानसिक, शारीरिक, आत्मिक, बौद्धिक एवं सामाजिक हितों को प्रभावित करती है। जो बच्चे बाल मजदूरी करते हैं, वे मानसिक रूप से अस्वस्थ रहते हैं और बाल मजदूरी उनके शारीरिकऔर बौद्धिक विकास में बाधक होती है। बालश्रम की समस्या बच्चों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित करती है, जो कि संविधान के विरुद्ध हैऔर मानवाधिकार का सबसे बड़ा उल्लंघन है। बालश्रम की समस्या भारत में ही नहीं, दुनिया के कई देशों में एक विकट समस्या के रूप में विराजमान है जिसका समाधान खोजना जरूरी है। भारत में 1986 में बालश्रम निषेध और नियमन अधिनियम पारित हुआ।इस अधिनियम के अनुसार बालश्रम तकनीकी सलाहकार समिति नियुक्त की गई। इस समिति की सिफारिश के अनुसार खतरनाक उद्योगों में बच्चों की नियुक्ति निषिद्ध है। भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों में शोषण और अन्याय के विरुद्ध अनुच्छेद 23 और 24 को रखा गया है। अनुच्छेद 23 खतरनाक उद्योगों में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है। संविधान के अनुच्छेद 24 के अनुसार 14 साल के कम उम्र का कोई भी बच्चा किसी फैक्टरी या खदान में काम करने के लिए नियुक्त नहीं किया जाएगा और न ही किसी अन्य खतरनाक नियोजन में नियुक्त किया जाएगा। फैक्टरी कानून 1948 के तहत 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों केनियोजन को निषिद्ध करता है। 15 से 18 वर्ष तक के किशोर किसी फैक्टरी में तभी नियुक्त किए जा सकते हैं, जब उनके पास किसी अधिकृत चिकित्सक का फिटनेस प्रमाण पत्र हो। इस कानून में 14 से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिए हर दिन 4.30 घंटे की कार्यावधि तय की गई है और रात में उनके काम करने पर प्रतिबंध लगाया गया है। फिर भी इतने कड़े कानून होने के बाद भी बच्चों से होटलों, कारखानों, दुकानोंइत्यादि में दिन-रात कार्य कराया जाता हैं और विभिन्न कानूनों का उल्लंघन किया जाता है जिससे मासूम बच्चों का बचपन पूर्ण रूप से प्रभावित होता है। बालश्रम की समस्या का समाधान तभी होगा, जब हर बच्चे के पास उसका अधिकार पहुंच जाएगा। इसके लिए जो बच्चे अपने अधिकारों से वंचित हैं, उनके अधिकार उनको दिलाने के लिए समाज और देशको सामूहिक प्रयास करने होंगे। आज देश के प्रत्येक नागरिक को बाल मजदूरी का उन्मूलन करने की जरूरत है और देश के किसी भी हिस्से में कोई भी बच्चा बाल श्रमिक दिखे, तो देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह बाल मजदूरी का विरोध करे। इसके साथ ही बड़ी उम्र के मजदूरों को कोई भी बाल मजदूर दिखे तो उन्हें खुद बाल मजदूरी रोकने के लिए आगे आना चाहिए और बाल मजदूरी काविरोध करना चाहिए। अगर देश से बाल मजदूरी रुकेगी तो मजदूर दिवस मनाना भी तभी सार्थक होगा।'मजदूर दिवस' के अवसर पर संपूर्ण राष्ट्र और समाज को राष्ट्र और समाज की प्रगति, समृद्धि तथा खुशहाली में दिए गए श्रमिकों के योगदानको नमन करना चाहिए। देश के उत्पादन में वृद्धि और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो उच्च मानक हासिल किए गए हैं, वे हमारे श्रमिकों के अथक प्रयासों का ही नतीजा हैं। इसलिए राष्ट्र की प्रगति में अपने श्रमिकों की महत्वपूर्ण भूमिका को पहचानकर सभी देशवासियों को उसकी सराहना करनी चाहिए। इसके साथ ही मजदूर दिवस के अवसर पर देश के विकास और निर्माण में बहुमूल्य भूमिका निभाने वाले लाखों मजदूरों के कठिन परिश्रम, दृढ़ निश्चय और निष्ठा का सम्मान करना चाहिए और मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए संपूर्ण राष्ट्र औरसमाज को सदैव तत्पर रहना चाहिए।



Sunday, 30 April 2017

सामाजिक व्यथा

"मनष्य एक सामाजिक प्राणी है ।" -----ऐसा प्रसिद्ध दार्शनिक 'अरस्तु ' ने कहा है। 
परंतु मनुष्य जितना सामाजिक है, उतना ही वैयक्तिक भी । इसलिए एक तरफ सामाजिक व्यथा से जाग्रत आत्मा वाला व्यक्ति यथार्थवादी हो जाता है; वहीं दूसरी तरफ सम्पन्न परिस्थिति में अपनी भावनाओं के मनोहर कोष से चेतन आत्मा वाला व्यक्ति भावना- प्रधान और कल्पना प्रधान हो जाता है ।
परन्तु यह भी सत्य है कि जब कोई भावना प्रधान प्राणी बाह्य वास्तविकता की ओर मुड़ता है तो अपनी सहज ईमानदारी से वशिभूत होकर ,उसके प्रति अपने को जिम्मेवार ठहराता है और उसके बाद ही वह "सृजन"हो पाता है जिसे आदर्शवादी कहा जाता है। आदर्शवादी सर्जक जीवन पर सोचने लगता है , जीवन की ट्रेजडीज , उसके विरोध और विसंगतियाँ , उसके मन में कहीं गहराई में बैठ जाती हैं ।वह उन विचारों से किसी प्रकार छुटकारा नहीं पा पाता । वह उन पर सोचता है,कुछ निष्कर्षों पर पहुँचता है और उन सबका चित्रांकन करता है । यह विशेष प्रकार का सर्जक जीवन को समस्त रूप में ग्रहण करने की चेष्टा करता है । यही उसकी विशेषता है।
उदाहरणतः , 'कबीर' जब तक अपने रंग में मस्त होकर जीवन का ज्ञान सुनाते हैं, तभी तक वह सर्जक कलाकार दिखते हैं । पर जैसे ही 'कबीर ' अपने बौद्धिक -दार्शनिक निर्गुणवाद के प्रति आस्था रखने का आग्रह करते दिखते है; उनकी सृजनात्मकता खण्डित होने लगती है और वे सृजन छोड़ दर्शन के दुरूह क्षेत्र में प्रवेश कर जाते है, जिसके अलग नियम है ।
इस बारे में आप क्या सोचते हैं? क्योकि 

इस दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं, हम वो सब कर सकते है, जो हम सोच सकते है और हम वो सब सोच सकते है, जो आज तक हमने नहीं सोचा |

हम एक असफल समाज क्यूँ हैं?


 हम एक असफल समाज क्यूँ हैं?
अगर आप समाज के बारे में सोचें तो बहुत से प्रश्न आपके सामने आकर खड़े हो जाते हैं लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न में यह समझता हूँ यह है कि हम समाज के रूप में असफल क्यूँ हैं? समाज एक व्यक्ति नहीं है अगर समाज की पहचान नहीं बन पाई या समाज की प्रगति नहीं हुई तो यह पूरे समुदाय पूरे समाज की असफलता है, यह हमारे बड़े बुजुर्गों की असफलता है की वे नई पीढ़ी के लिए आदर्श स्थापित नहीं कर पाए, कोई मार्ग नहीं दिखा पाए और यह वर्तमान पीढ़ी की भी असफलता है की हम भावी पीढ़ी के लिए कोई आदर्श स्थापित करने के प्रति चिंतित नहीं हैं |
हमें यह सोचना ही होगा कि अगर समाज के किसी व्यक्ति को किसी प्रकार की प्रतिकूल स्थिति का सामना करना पड़े तो वह समाज में किसका सहारा ढूंढे? समाज के बच्चों को अगर अपनी शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता की आवश्यकता पड़ जाये तो वह सहायता के लिए किस से उम्मीद लगाये? समाज में बहुत से ऐसे परिवार हैं जो पुश्तेनी कार्य करके अपना परिवार पालन का कर रहे हैं और कई परिवार ऐसे भी हैं जहाँ एक व्यक्ति की मजदूरी से पूरा परिवार पलता है ऐसे में अगर घर का मुखिया पर कोई कठिनाई आ पड़े तो वह सहायता के लिए किसे पुकारे? गरीब परिवारों केलिए मजदूरी करके परिवार को पालना बहुत कठिन काम है ऐसे में अगर समाज से उसे बच्चों की शिक्षा के लिए, बीमारी में दवाई के लिए, परिवार में मंगलकार्य होने पर किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता हो तो वह किसका मुह देखे ?
सैकड़ों सालों में भी अगर हम अपने समाज में इस तरह की व्यवस्थाएं नहीं कर पाए तो यह हमारी व्यक्तिगत और सामूहिक असफलता है | यह समाज के उन जिम्मेदार लोगों की असफलता है जो वर्षों से समाज के पदाधीश बन के तो बेठे रहे लेकिन समाज के लोगों की सुध लेने की जिन्हें कभी फुर्सत नहीं मिली, अपने पदों पर बने रहने के लिए जमीन आसमान एक कर देने वाले जिम्मेदार लोगों की असफलता है यह कि उन्हें कई दशकों बाद भी समाज के लिए कुछ ना कर पाने का कोई अहसास नहीं है | क्या यह जिम्मेदार लोगों की मात्र लापरवाही है या कुछ और बात है? आज भी किसी को समाज के लोगों को सामाजिक तकलीफों की उन्हें दूर करने की चिंता नहीं है सब अपनी अपनी ढपली बजने में अपना अपना राग अलापने में लगे हैं और समाज की वास्तविक समस्याएं यथावत सर उठाये खड़ी हैं और निकट भविष्य में इन समस्याओं के दूर होने की कोई उम्मीद भी नजर नहीं आती | जब कोई समस्याओं के बारे में, समाज के लोगों की उम्मीद के बारे में विचार ही नहीं करना चाहता तो इन समस्याओं के
निराकरण की उम्मीद कैसे करोगे |
समाज को सही दिशा देने की जिम्मेदारी किसकी ?
लोगों की प्राथमिकताओं में समाज की प्रगति, समाज के कमजोर नागरिकों के कल्याण की कोई योजनायें ही शामिल नहीं हैं तो लोगों के कल्याण के लिए हम करेंगे भी तो क्या? जिम्मेदार लोगों के पास कोई विचार ही नहीं है की वे समाज को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं | कभी किसी सार्वजनिक बातचीत में लोगों के लिए कल्याणकारी योजना बनाने की बात नहीं उठी, कभी बच्चों की शिक्षा की चिंता नहीं जताई गई, समाज के लोगों केलिए बीमारी में दवाई, इलाज की व्यवस्था मुद्दा नहीं बना, संकटकाल में किस तरह की मदद समाज के लोगों के लिए उपलब्ध होनी चाही किसी ने नहीं सोचा | हमारी सामाजिक चर्चाओं का विषय कभी यह नहीं रहा की किस तरह समाज के बच्चों को अन्य समाज के बच्चों के सामान प्रतियोगी माहोल दिया जाये जिससे वे रोजगार के नए क्षेत्रों की और अग्रसर हो सकें | न कला को प्रोत्साहन की बात होती है कभी न रोजगार, व्यापार-व्यवसाय के नए तरीकों से युवाओं को अवगत करने की कोशिश होती है और ना हम युवाओं को सामाजिक स्तर पर कोई मोका देना चाहते हैं आखिर समाज के रूप में हम असफल ना हो तो और क्या हो!
जब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों की वजह दूसरों को मानते है, तब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों को मिटा नहीं सकते  |

आम का इतिहास

पुर्तग़ाली व्यापारी भारत में आम लेकर आए थे। इसके बीजों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में कठिनाई के कारण संभवतः 1700 ई. में ब्राज़ील मे...